Friday, July 07, 2006

Shakti Aur Kshama

Bahut dinon se is kavita ki taalash mein tha. Ramdhari Singh Dinkar waise bhi mere priya kavi hain aur is kavita ki ye panktiyan to humesha se man mein rachi basin thin

Kshama shobhati us bhujang ko
jiske paas garal ho
usko kya jo dantheen
vishrahit, vineet, saral ho

Sahansheelta, kshama, daya ko
tabhi poojta jag hai
bal ka darp chamakta
jab uske peeche jagmag hai


Isliye badi khushi mili is kavita ko net pe dhoondh kar.

Poori kavita Devnaagri mein yahan padhein.

12 comments:

Dawn....सेहर said...

Manish title se mujhe aur koi nahi balke Ramdhari Singh Dinkar hee yaad aaye infact gar tum oonka zikr nahi karte to shayd mein pooch baith ti tum se :)
amazing...kuch yaadon ke jungle se chune huye pal yaad aagaye :)
Cheers

Manish said...

DON kuch yaadon ke jungle se chune huye pal yaad aagaye :)

kuch khushbuyein yadon ke jungle se bah chalin...chaliye hmne aapko kavyamay to kar hi diya.

Sayesha said...

Wow Manish, what a find!!! I read this one in school!!!!!! :)

akhil said...

Kuchh dinon pahle main bhi ghoomta firta yahaan pahuncha tha...

http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgranth/kurukshetra/kurukshetra1.htm

CBSE ki navami-dasavi me woh "swati" aur "paraag" ne sach hindi ko bachaa ke rakha hai. :)

The Perfect Brewing said...

Yeps !!!! Good find. And thanks for posting this.

Manish said...

Akhil Anubhuti aur Abhivyakti par main aksar jaya karta hoon. Par Kurushetra ke kis sarg mein ye kavita hai ye mujhe pata nahin tha. Mujhe to ye poem ek blog pe image form mein mili. Dekho Mumbai ke bam dhamake humari sahansheelta ki hi pareeksha le rahe hain na.

Manish said...

Avi Blog par aane ka shukriya Avi. Jaankar khushi huyi ki aapko bhi ye kavita pasand hai :)

Manish said...

Sayesha Tumhari tarah se maine bhi ise school mein hi padha tha. Isi liye ise dobaara dhoondh pane mein behad khushi huyi.

Anonymous said...

प्रिय मनीष
आपका चिट्ठा बहुत अच्छा लगा। यदि और कुछ कविताएं ला सको तो अच्छा लगेगा। मैं आपका एक पुराना पोस्ट देख रहा था जिसमें बच्चन की "जो बीत गई सो बीत गई" रोमन में थी मुझसे रहा नहीं गया मैने इसे देवनागरी में
आपके पाठकों के लिए लिख दी है। आशा है आपको अच्छा लगेगा।
अवधेश
जो बीत गई सो बात गई – बच्चन

जीवन में एक सितारा था
माना वोह बेहद प्यारा था
वोह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई .... जीवन में था वो एक कुसुम
थे उस पर नित्य न्योछावर तुम
वो सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
जो मुरझाई फिर कहां खिलती
पर बोलो सूखे फूलों पे
कब मधुवन शोक मनाता है?
जो बीत गई सो बात गई.....
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वोह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों में
कब मदिरालय पछताता है?
जो बीत गई सो बात गई........ मृदु मिट्टी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेके आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट मधु के प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वोह मधु लूटा ही करते हैं
वो कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है?
जो बीत गई सो बात गई......

Anonymous said...

प्रिय मनीष,
आपने ऊपर पूछा है कि कुरुक्षेत्र के कौन से सर्ग से यहाँ कविता ली गई है तो दिनकर जी की कुरुक्षेत्र का तीसरा सर्ग देखिए। वैसे वीर रस पर कुरुक्षेत्र एक अतिउत्तम कृति है।
अवधेश

Manish said...

अवधेश जी कविता देवनागरी में बांटने के लिये धन्यवाद ! मैंने अब देवनागरी में लिखना प्रारंभ कर दिया है । आप वहाँ आएँगे तो मुझे खुशी होगी। ब्लॉग का पता है
www.ek-shaam-mere-naam.blogspot.com

Anonymous said...

kavita kb likhi(date) bata sakta hai koi mujhe???